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वैदिक ज्योतिष सीखें

गुरु — ज्ञान, भाग्य और कृपा

ग्रह5 min मिनट का पाठ · 2026-06

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गुरु ज्योतिष का महान शुभ ग्रह है — ज्ञान, संतान, धन और धर्म का कारक। जानिए बलवान गुरु किसी कुंडली को कैसे आशीर्वाद देता है।

सर्वाधिक शुभ ग्रह

गुरु अथवा बृहस्पति देवताओं के आचार्य और नौ ग्रहों में सर्वाधिक शुभ हैं। यह ज्ञान, विद्या, धर्म, संतान, धन, आशावाद, श्रद्धा, गुरुजन तथा सौभाग्य का कारक है। गुरु धनु और मीन का स्वामी है, कर्क में उच्च और मकर में नीच होता है।

गुरु जहाँ बैठता है और जिस पर दृष्टि डालता है, वहाँ प्रायः विस्तार, रक्षा और आशीर्वाद देता है। बलवान गुरु किसी कुंडली में कृपा के सबसे निश्चित चिह्नों में से एक है।

गुरु की दृष्टि और रक्षा

सभी ग्रहों की सप्तम दृष्टि के अतिरिक्त गुरु अपने स्थान से पंचम और नवम भाव पर विशेष दृष्टि डालता है। जब यह किसी निर्बल भाव या ग्रह को देखता है, तो उसे सहारा और कवच देता है। लग्न, चंद्र अथवा सप्तम भाव पर गुरु की दृष्टि रक्षा का शास्त्रीय चिह्न है।

चूँकि गुरु संतान और पंचम भाव का स्वामी है, यह संतति, शिक्षा और सृजनात्मक बुद्धि के प्रश्नों में केंद्रीय रहता है।

गुरु का सम्मान

गुरु को बल देने वाले उपायों में शिक्षकों और गुरुजनों का सम्मान, शास्त्र-अध्ययन, गुरुवार के नियम, पीली वस्तुओं का दान, तथा गुरु या विष्णु मंत्र का पाठ आते हैं। पुखराज गुरु का रत्न है।

उदारता, श्रद्धा और विद्या-प्रेम के साथ जीना स्वाभाविक रूप से गुरु के गुणों के अनुरूप है और स्वयं में एक उपाय है।

सामान्य प्रश्न

गुरु को महान शुभ ग्रह क्यों कहा जाता है?

यह ज्ञान, भाग्य, संतान और धर्म का कारक है, और जिसे भी स्पर्श करता है उसकी रक्षा तथा विस्तार करता है — इसीलिए ग्रहों में सर्वाधिक शुभ है।

गुरु किन भावों पर दृष्टि डालता है?

सामने के सप्तम भाव के अतिरिक्त गुरु अपने स्थान से पंचम और नवम भाव पर विशेष दृष्टि डालता है।

गुरु का रत्न कौन-सा है?

पुखराज गुरु से जुड़ा है और कुंडली-विश्लेषण के बाद उसके शुभ गुणों को बल देने हेतु धारण किया जाता है।

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